गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

नाटक दामाद की खोज की प्रस्तुति

**पिछले  दिनो
*बिगफुट और थिएटर क्लब इलाहाबाद की प्रस्तुति
*दामाद एक खोज*
हास्य और व्यंग नाटकों का मंचन मुश्किल काम है लेकिन आज के दौर में जबकि हमारी तनाव भरी जिंदगी में हंसने हंसाने के मौके लगातार कम होते जा रहे हैं ऐसे भी बहुत जरूरी हो गया है इस मुश्किल काम को लगातार अंजाम दिया जाए और कोशिश की जाए कि लोग हंसे और उनके जीवन कुछ वक्त के लिए ही सही शांति और राहत मिले हास्य व्यंग नाटकों का निर्देशन भी आसान काम नहीं है कहा तो यहां तक जा सकता है कि किसी को आसानी से बड़ा पुणे का दूसरा कोई काम नहीं है तनाव भरी जिंदगी में हंसी घोल देना किसी व्यक्ति को जीवन दे देने के समान है पिछले दिनों इलाहाबाद में इलाहाबाद की जानी-मानी दो नवोदित नाट्य संस्था बिगफुट और थिएटर क्लब इलाहाबाद ने कार्यशाला में तैयार किए गए हास्य व्यंग्य नाटक दामाद एक खोज की बड़ी मनोरंजक प्रस्तुति की युवा निर्देशिका मीनल के निर्देशन में पेश किए गए इस नाटक में  मीनल ने जिंदगी की  विसंगतियों और विकृतियों को परोस कर हमारे लिए हंसने के अवसर तलाश किए दर्शकों ने नाटक का भरपूर मजा लिया और सबसे बड़ी बात यह थी कि तालियां सही जगह पर बजाई इस नाटक की कथावस्तु मैं किस्म-किस्म के दामादों का इंटरव्यू लड़की के बाप ने किया इन दामादों के माध्यम से समाज के कुछ वर्ग पर तंज किया गया नाटक के मंच पर निर्देशिका मीनल ने बड़ी बेबाकी से रंगकर्मियों को भी अपने निशाने पर लिया और उनकी भी कमजोरियां उजागर की यह साहस बहुत कम मंच पर देखने को मिलता है दूसरे पर व्यंग करना आसान है लेकिन जब आप खुद पर व्यंग करते हैं हेलो आपको सच्चे और ईमानदार कलाकार स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं करते इस नाटक मैं नए कलाकारों को उनकी गलतियों और भूलों के साथ देखना बिल्कुल नया अनुभव था जो सच मानिए बहुत अच्छा लग रहा था कलाकारों ने जो किया उसकी तो सराहना की ही जानी चाहिए जो नहीं किया वह भी काबिले तारीफ था हास्य और व्यंग्य नाटक सही समय पर प्रतिक्रिया देने का मजेदार खेल है और इस खेल में सभी कलाकार मंच पर सफल हुए और उन्होंने यह भरोसा दिलाया कि उन्हें अवसर मिले तो वह बेहतरीन काम कर सकते हैं मीनल को हास्य और व्यंग नाटकों की प्रस्तुति में विशेषज्ञता हासिल करनी चाहिए वह ऐसा कर सकती है इस नाटक का मजेदार पहेली इस नाटक का अनाउंसमेंट था जिसमें उद्घोषक ने बहुत प्यार से दर्शकों को बताया क्यों चाहे तो अपना मोबाइल प्रेक्षागृह में खुला रख सकते हैं मोबाइल पर बात वह जरूर करें अपने काम का नुकसान ना करें फोटोग्राफर्स के लिए अनाम सर ने कहा कि अगर फोटोग्राफर को मंच के नीचे से फोटो लेने में कोई असुविधा हो रही हो तो वह मंच पर चढ़कर आराम से फोटो बना सकता है इस विरोधाभासी अनाउंसमेंट का इतना अच्छा असर हुआ की प्रेक्षागृह में एक बार भी मोबाइल नहीं बजा और न कोई फोटोग्राफर मंच पर चढ़ा नाटक की शुरुआत बिल्कुल एक अलग अंदाज में हुई और हमारी समझ में आ गया कि है नाटक हमें कहां ले जाएगा इस नाटक में कुछ वरिष्ठ कलाकारों ने भी शिरकत की उनका प्यार नए कलाकार उसको मिला पर एक नई परंपरा की शुरुआत हुई ऑल इंडिया न्यू पूरे मन से सभी कलाकारों को मीनल को और संस्था के सभी सक्रिय सदस्यों को बहुत-बहुत बधाई देता है ऐसी प्रस्तुतियां बहुत जरूरी है क्योंकि यह प्रस्तुतियां दर्शक तैयार करती है एक बार दर्शक बन गए तब नहीं कुछ भी दिखाइए वह बहुत प्यार से उसे देखेंगे और रंगकर्मियों का सम्मान करेंगे
समीक्षा और चित्र अजामिल

नाटक सखाराम बाईंडर की प्रस्तुति

**नाटक पिछले दिनों
**सखाराम बाईंडर  मंच पर का अनुवादिका श्रीमती सरोजिनी वर्मा द्वारा मराठी के वर्चस्वी नाटककार श्री विजय तेंडुलकर की अत्यंत विवादस्पद और बहुचर्चित कृति ‘सखाराम बाइंडर’ की सशक्त और प्राणवान प्रस्तुतियों ने देश की लगभग सभी भाषाओं के रंगमंच को नई दिशा और नया सोच प्रदान किया है इस नाटक में दांपत्य जीवन की गोपनीय नैतिकता का साहसपूर्ण ढंग से पर्दाफाश किया गया है है। सरकारी नियंत्रण को चुनौती देकर उच्चतम न्यायालय से लेखकीय अभिव्यक्ति के आधार पर मान्यता पाने वाला अपने ढंग के इस अकेले और अनूठे नाटक‘सखाराम बाइंडर’ को इस तरह प्रस्तुत किया गया है कि वह गलाजत से भरी दिखावटी संभ्रांतता को पहली बार इतने सक्षम ढंग से चुनौती देता है। रटे-रटाये मूल्यों को सखाराम ही नहीं इस नाटक के सारे पात्र अपनी पात्रता की खोज में ध्वस्त करते चले जाते हैं। जिन नकली मूल्यों को हम अपने ऊपर आडम्बर की तरह थोप कर चिकने-चुपड़े बने रहना चाहते है, उसे सही-सही इस आइने में निर्ममता से उघडता हुआ देखते हैं। ‘सखाराम बाइंडर’ वही आइना है। भाषा के स्तर पर सारे पात्र बड़ी खुली और ऐसी बाजारुपन से संयुक्त भाषा का प्रयोग करते हैं जिन्हें हमने अकेले-दुकेले कभी सुना जरुर होगा। किन्तु उसे अपने संस्कारिता का अंश मानने में सदैव कतराते रहे हैं। पुरे नाटक में कथावस्तु की विलक्षणता न होते हुए भी पात्रों का आपसी संयोजन भाषा के जिस स्तर पर नाटककार ने किया है वही नाटकीयता को दरकिनार कर जीवन के सत्य को पूरी ईमानदारी से सामने लाता है पिछले दिनों इसी नाटक सखाराम बाईंडर की विचारोत्तेजक प्रस्तुति बेहद सादगी के साथ इलाहाबाद में लगभग 30 वर्षों के बाद वरिष्ठ रंग निर्देशक अफजल खान के निर्देशन में की गई उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के प्रेक्षागृह में प्रस्तुत किए गए इस नाटक ने दर्शकों को एक नया अनुभव और जीवन के अनकहे सच को साझा करने के लिए प्रेरित किया सबसे अच्छी बात यह थी की नाटक को मंच तक लाने की पूरी परिकल्पना इतनी सहज और कसी हुई थी कि नाटक की कथावस्तु को कहीं से भी कोई नुकसान नहीं पहुंचा हिंदी रंगमंच पर इस नाटक की प्रस्तुति वैसे भी जोखिम भरा काम है परंतु अफजल खान ने इसे पूरे साहस के साथ अपने हाथ में लिया और इसे कर दिखाया नाटक में जिस तरह के कंपोजीशन बनाए गए वे नाटक की प्रस्तुति को एक नया व्याकरण दे रहे थे इस नाटक के सभी पात्रों ने अभिनय के दौरान न सिर्फ स्वयं को अपने से मुक्त किया बल्कि अपनी भूमिका में दाखिल होने में सफलता प्राप्त की खासतौर पर महिला पात्रों ने अपनी भूमिका उम्मीद से ज्यादा बेहतर ढंग से निभाई यद्यपि महिला पात्रों के लिए इस नाटक की चुनौती भरी भूमिकाओं में परकाया प्रवेश बहुत मुश्किल था परंतु इन्होंने इसे संभव कर दिखाया रेनू राज सिंह और प्रतिमा वर्मा दोनों वरिष्ठ रंग अभिनेत्रियां है और यह दोनों ही पूरी समझ के साथ आंखों से बोलना जानती है इसीलिए यह दोनों अभिनेत्रियां अपनी भूमिकाओं को पूरी शिद्दत से जी सकी नाटक के अन्य पात्रों ने मुख्य पात्रों को बहुत अच्छे ढंग से सपोर्ट किया संवाद अदायगी मैं कलाकारों की आवाज बेशक जरूरत से कुछ कम थी जिसके कारण संवाद को सुनने में कहीं-कहीं असुविधा हुई बावजूद इसके सभी पात्रों ने बिना किसी अतिरिक्त उत्तेजना के अपनी भूमिका निभाई और सफलता पाई सखाराम बाईंडर एक ऐसा नाटक है जिस की प्रस्तुति के लिए निर्देशक का संवेदनशील होना बहुत जरूरी है सभी यह नाटक दर्शकों तक अपने संदेश को ले जा सकेगा इस प्रस्तुति में संदेश को अफजल खान पूरे सम्मान के साथ दर्शकों के सामने रख सके संगीत और बेहतर किया जाना चाहिए वहीं प्रकाश परिकल्पना मैं भी अभी काफी गुंजाइश ह इसमें कोई संदेह नहीं  35 साल बाद फिर से प्रस्तुत हुआ नाटक सखाराम बाईंडर पहले से काफी बेहतर रहा  ** समीक्षक अजामिल

सोमवार, 2 अप्रैल 2018

नौटंकी पंच परमेश्वर की प्रस्तुति

**स्वर्ग रंगमंडल ने की प्रेमचंद की बहुचर्चित कहानी पंच परमेश्वर पर आधारित नौटंकी की शानदार प्रस्तुति
इलाहाबाद की लोकनाट्य और लोक संस्कृति को समर्पित संस्था स्वर्ग रंग मंडल ने मुंशी प्रेमचंद की सुप्रसिद्ध कहानी पंच परमेश्वर पर आधारित और राजकुमार श्रीवास्तव द्वारा रूपांतरित नौटंकी की शानदार प्रस्तुति की जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में नौटंकी रसिक और रंग दर्शक उत्तर प्रदेश क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के प्रेक्षागृह में उपस्थित हुए इस नौटंकी का निर्देशन वरिष्ठ रंगकर्मी और लोकनाट्य विशेषज्ञ अतुल यदुवंशी ने उतनी ही सादगी के साथ किया जितनी सादगी के साथ इस कहानी को मुंशी प्रेमचंद जी ने कलमबद्ध किया है सबसे अच्छी बात यह है कि यह नौटंकी रूपांतरण उन सभी जीवन मूल्यों को पूरी सहायता के साथ दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत करता है जिनकी चर्चा मुंशी प्रेमचंद ने कहानी में की है बिना किसी तामझाम के एक सहज परिकल्पित मंच पर नौटंकी के सभी पात्र पारंपरिक नौटंकी की सीमाओं को धीरे धीरे तोड़ते हैं और कहानी के अर्थ को सार्थक करते हुए एक नया विस्तार लेते हैं नौटंकी के निर्देशन में अतुल यदुवंशी किसी पात्र पर कोई दबाव नहीं बनाते बल्कि उन्हें अर्थ विस्तार के लिए पर्याप्त क्षेत्र प्रदान करते हैं निश्चय ही ऐसा करने में राज कुमार श्रीवास्तव की नौटंकी रूपांतरण ने उन्हें पूरा पूरा सहयोग किया है मुझे ऐसा लगता है कि समय के अनुसार नौटंकी को आज के संदर्भ में और अधिक प्रासंगिक बनाने के लिए जरूरी है कि रुपांतर कार भी कहानी की सीमा से बाहर निकलकर सभी साधकों को नया अर्थ देने का प्रयास करें राज कुमार श्रीवास्तव ने काफी सीमा तक यह कोशिश की है और जिसे धारदार बनाने में अतुल यदुवंशी ने कोई कसर नहीं छोड़ी है नौटंकी में सूत्रधार अपने अभिनय और अभिव्यक्ति में पूरी तरह सफल रहे नट नटी दोनों की आवाज नौटंकी के प्रसंगों के साथ पूरे उतार चढ़ाव के दर्शक को स्पर्श करती रही सभी महिला पात्रों ने डूब कर अभिनय किया सोनम सेठ एक बेहतरीन रंग अभिनेत्री है लेकिन  इस नौटंकी में  उन्हें जो भूमिका दी गई वह उनके  व्यक्तित्व के अनुकूल नहीं थी बावजूद इसके  सोनम सेठ  ने बड़ी बारीकी से  वह सब कुछ निकाल दिया और किया  जो  उनका चरित्र  डिमांड करता था और सोनम सेठ को  यथोचित  सराहना भी मिली अन्य सभी पात्र इस बेहतरीन नौटंकी  के बेहतरीन पेच पुर्जे साबित हुए सभी ने अपनी भूमिका पूरी शिद्दत के साथ निभाई और नौटंकी को सब तरफ से कैसे रहे अतुल यदुवंशी जब नौटंकी करते हैं तो नौटंकी को नाटक की तकनीक से अलग नहीं रखते नौटंकी परंपरा और नाट्य परंपरा का मिलाजुला स्वरूप उनकी नौटंकी में देखने को मिलता है मनोरंजन को अतुल यदुवंशी नौटंकी की पहली शर्त मानते हैं कोई गंभीर बात कहने से पहले अतुल यदुवंशी अपने दर्शकों को पूरी तरह रिलैक्स करते हैं अपने दर्शकों को वह स्वतंत्रता देते हैं कि वह नौटंकी के कंटेंट के बारे में अपने तरीके से सोचें अतुल यदुवंशी नौटंकी में कोई ऐसी बात नहीं करते जिससे उनका दर्शक किसी तरह के तनाव में आए इसके स्थान पर अतुल संवाद की संभावनाएं तलाश करते हैं जो कि नौटंकी को फिलहाल उनका योगदान कहा जा सकता है पंच परमेश्वर नौटंकी में सेट नहीं था इसकी कोई आवश्यकता भी महसूस नहीं हुई लेकिन नौटंकी के पारंपरिक संगीत में माहौल को जीवंत कर दिया था सच कहा जाए तो पंच परमेश्वर नौटंकी की शर्तों पर पूरी तरह खरी उतरती है और यह बताती है कि आने वाला समय मनोरंजन के सिलसिले में एक बार फिर अपनी जमीन के साथ जुड़ने वाला है और नौटंकी नौटंकी नहीं रह जाएगी बल्कि वह तमाम दृश्य कलाओं का आधार बनेगी रंगकर्मियों में जमीन से जुड़कर दोनों हाथ ऊपर उठाकर पूरा आकाश समेट लेने की आकांक्षा दिखाई दे रही है और नौटंकी की तरफ उनकी आस्था फिर वापस हो रही है यह सुखद है ऑल इंडिया न्यू थिएटर पंच परमेश्वर नौटंकी के सभी कलाकारों निर्देशक और नौटंकी रूपांतर कार को इस सफल प्रस्तुति के लिए बहुत-बहुत बधाई देता है हमारे विश्वास है कि स्वर्ग रंगमंडल नौटंकी की जीवंत वापसी के लिए ही संघर्ष नहीं कर रहा है बल्कि नई सोच के साथ नई परंपराएं भी बना रहा है स्वर्ग रंगमंडल की पूरी टीम को बहुत-बहुत बधाई और ढेर सारी शुभकामनाए।
** अजामिल ं
सभी चित्र विकास चौहान

रविवार, 1 अप्रैल 2018

नौटंकी कफ़न की शानदार प्रस्तुति

××स्वर्ग रंगमंडल ने की नौटंकी कफन की शानदार प्रस्तुति
इलाहाबाद की सुप्रसिद्ध नाट्य संस्था स्वर्ग रंगमंडल ने अमर कथा कार मुंशी प्रेमचंद की विश्व प्रसिद्ध कहानी कफन की नौटंकी शैली में उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के प्रेक्षागृह में शानदार प्रस्तुति की .. इस नौटंकी का निर्देशन वरिष्ठ रंगकर्मी एवं लोकनाट्य विशेषज्ञ अतुल यदुवंशी ने किया साहित्य का बहुत बड़ा अनुरागी वर्ग इस कहानी से अच्छी तरह परिचित है कहानी के पात्र घीसू माधव के जरिए यह कहानी मानवीय संवेदनाओ की सीधी सच्ची तस्वीर हमारे सामने उजागर करती है इस कहानी का नौटंकी रूपांतरण बहुचर्चित रूपांतरकार राज कुमार श्रीवास्तव ने  किया है. यह कहानी  साफ तौर पर यह स्पष्ट करती है कि आदमी परिस्थितियों का गुलाम हो जाता है अतुल यदुवंशी एक प्रयोगधर्मी रंगकर्मी हैं जो अपनी रंग परिकल्पना में नौटंकी की परंपरा का सम्मान भी करते हैं और नए प्रयोगों के जरिए नौटंकी को आज के दर्शकों की रूचि के अनुकूल भी कलात्मकता देते चलते हैं जिसके कारण दर्शकों को उसे स्वीकारने में आसानी भी होती है अतुल यदुवंशी ने अपनी परिकल्पना के अनुसार मंच पर कहानी का वातावरण पैदा करने में सफलता प्राप्त की नौटंकी मैं पारंपरिक रुप से नट नटी का उपयोग न करके अतुल यदुवंशी ने दो जोकर को सूत्रधार की भूमिका में प्रस्तुत किया इस प्रयोग ने नौटंकी में बहुत कुछ अनकहा कह दिया इस नौटंकी के बहुत से हिस्से काफी मार्मिक हो गए यह एक मुश्किल काम था जिसे  अतुल यदुवंशी ने पूरी  सहजता के साथ कर दिखाया नौटंकी में सभी पात्रों ने अपनी अपनी भूमिका के साथ न्याय किया खास तौर पर घीसू माधव और बुधिया तीनों ही अपनी भूमिका मैं पूरी तरह सफल रहे अन्य सभी पात्रों ने नौटंकी को यथोचित गति प्रधान की पात्रों की वेशभूषा नौटंकी की कथावस्तु के बिल्कुल अनुकूल थी अतुल यदुवंशी ने नौटंकी में बहुत से कंपोजीशन बहुत नेचुरल पेश किए शराब की दुकान वाला हिस्सा ज़रूर थोड़ा कमजोर रहा सबसे अच्छी बात यह थी सूत्रधार और सभी मुख्य पात्रों की आवाज नौटंकी के अनुकूल थी कफन कहानी की मूल आत्मा और उसके दर्शन को यह नौटंकी बहुत सहजता से दर्शकों के सामने रखती है और हमें जीवन के सत्य के रूबरू करती है इस शानदार प्रस्तुति के लिए ऑल इंडिया न्यू थिएटर स्वर्ग रंगमंडल और इस नौटंकी की पूरी टीम को बहुत-बहुत बधाई देता है आमतौर पर कफन जैसी कहानियां नौटंकी के लिए उपयुक्त नहीं मानी जाती लेकिन अतुल यदुवंशी ने यह साबित कर दिया कि यदि गंभीरतापूर्वक प्रस्तुति की जाए तो कफ़न की कहानी भी लोगों के दिलों को झकझोर सकती है । इस नौटंकी प्रस्तुति की उद्घोषिका बहु चर्चित रंग अभिनेत्री और रंग निर्देशिका रितिका अवस्थी रही ।
×× अजामिल
सभी चित्र विकास चौहान

नौटंकी कफन की शानदार प्रस्तुति

शुक्रवार, 2 मार्च 2018

अभिलाष नारायण वरिष्ठ रंगकर्मी होली पर

इलाहाबाद के बहुचर्चित वरिष्ठ रंगकर्मी और सिद्ध अभिनेता अविनाश नारायण जी होली पूरी मस्ती के साथ खेलते हैं उनकी यह तस्वीर हम ऑल इंडिया न्यू थिएटर की आर्काइव से निकालकर आप सबके साथ साझा कर रहे हैं यह तस्वीर इलाहाबाद के रंग जगत के सभी अभिनेताओं और रंग निर्देशकों का प्रतिनिधित्व करती है इलाहाबाद के सभी रंगकर्मियों को होली की ढेर सारी शुभकामनाएं हमें याद रखना चाहिए रंगमंच पर रंगबाजी हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है ।
अजामिल

शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

महारथी का लोकार्पण

*लोकार्पण  उत्सव *
नाटक  महारथी  का विमोचन
इलाहाबाद की जानी-मानी नाट्य संस्था बैकस्टेज के तत्वावधान मैं सुप्रसिद्ध नाटककार रंग निर्देशक और अभिनेता
विभांशु वैभव के नए नाटक महारथी का लोकार्पण प्रसिद्ध नाटककार कथाकार कवि अजित पुष्कल और साहित्य आलोचक प्रोफेसर संतोष भदौरिया लोकनाट्य विशेषज्ञ अतुल यदुवंशी आलोचक डॉक्टर अनुपम आनंद रंग निर्देशिका सुषमा शर्मा वरिष्ठ पत्रकार धनंजय चोपड़ा और अजामिल ने संयुक्त रुप से किया इस अवसर पर नाटककार विभांशु वैभव के पिता आदरणीय गौरी शंकर जी भी उपस्थित रहे लोकार्पण के बाद वक्ताओं ने कहा की विभांशु वैभव का नाटक महारथी विगत 20 वर्षों से देश के तमाम हिस्सों में तमाम नाट्य संस्थाओं द्वारा पूरे दमखम के साथ खेला जा रहा है और रंगकर्मी इसकी विषय वस्तु को आज के दौर का जरूरी विमर्श मानते हुए पूरे मन से नए नए प्रयोगों के साथ इसे खेल रहे हैं यह सफल नाटक नाटक की कसौटी पर पूरी तरह से जाने के बाद प्रकाशित हुआ है निश्चय ही यह हिंदी रंगकर्म के लिए बहुत बड़ी बात है ऐसा ही होना चाहिए विभांशु वैभव भी इस नाटक को नाटक के क्राफ्ट के स्तर पर तथा विषय वस्तु को लेकर लगातार सतर्क रहे और उन्होंने इसके प्रकाशन में कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई महाभारत के महारथी और उपेक्षित पात कर्ण्र  के अंतर्द्वंद और संघर्षों की कहानी को कहता यह नाटक आज इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि कर्ण आज के समाज में भी उसी संघर्ष और उपेक्षा को झेल रहा है इसमें कोई शक नहीं कि नाटककार ने कर्ण को केवल एक मिथक ही नहीं रहने दिया है बल्कि उसके अंतर्द्वंद के जरिए तमाम ऐसे सवाल उठाए हैं जिसके जवाब आज भी संवेदनशील समाज मांग रहा है क्राफ्ट के स्तर पर यह नाटक बेहद कसा हुआ है और सबसे बड़ी बात यह है कि यह नाटक अत्यंत पठनीय है आमतौर पर नाटक पठनीय नहीं होते उनकी प्रस्तुति में ही पता चलता है कि नाटक क्या है लेकिन महारथी एक ऐसा नाटक है जो अपनी पठनीयता में ही पाठक को न सिर्फ अपनी गिरफ्त में ले लेता है बल्कि उसे विमर्श के लिए तैयार भी करता है इस नाटक के संवाद नाटकीयता से बहुत दूर है बल्कि नाटक को पढ़ते और खेलते समय ऐसा लगता है जैसे यह किसी संवेदनशील व्यक्ति की सोचने की भाषा है नाटक में शब्दाडंबर नहीं बल्कि शब्द और कथ्य की सहज सार्थक अभिव्यक्तिै है जिसके कारण इसकी संप्रेषणीयता बहुत ज्यादा महसूस की गई है यह नाटक स्तब्ध कर देता है और हमें तैयार करता है कि हम अपने समाज के बारे में एक बार फिर सोचें और बार बार सोचें इस विशेष कार्यक्रम में इलाहाबाद के तमाम जाने माने रंगकर्मी उपस्थित रहे विभांशु वैभव ने भी नाटक के संदर्भ में अपनी बातें रखी और उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात का बहुत संतोष है कि उनका नाटक लगातार रंग संस्थाओं द्वारा खेला जा रहा है और यही उनकी सफलता भी है ।
** चित्र व रिपोर्ट  अजामिल