बुधवार, 10 जनवरी 2018

नाटक हवालात की प्रस्तुति

**नाटक / बैकस्टेज  की प्रस्तुति -  हवालात  **निर्देशक / प्रवीण शेखर इलाहाबाद की सुप्रसिद्ध नाट्य संस्था बैकस्टेज ने हिंदी के चर्चित कवि पत्रकार सर्वेश्वर दयाल सक्सेना लिखित नाटक हवालात की प्रस्तुति कवि केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं के साथ उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के प्रेक्षागृह में की यह नाटक सर्दी और भूख से परेशान 3 तथाकथित आम आदमी और एक दरोगा के माध्यम से आज की सियासत में चल रहे् कुचक्र और यह भी बताता है कि किस तरह  की ओर इशारा करता है और यह भी बताता है कि किस तरह यथास्थिति बनाए रखने की साजिश चल रही है और विरोध के स्वर दबाए जा रहे हैं इस नाटक का कथ्य काफी जोरदार था लेकिन हल्के फुल्के मनोरंजन के लटके-झटकों के चलते यह नाटक कई स्थानों पर पुनरावृति का शिकार हो गया मनोरंजन नाटक के लिए बहुत जरूरी है लेकिन मनोरंजन के चलते अगर नाटक के कंटेंट को नुकसान पहुंचता है तो इसे उचित नहीं ठहराया जा सकता nache निर्देशक प्रवीण शेखर को अब दर्शक एक ब्रांड की तरह लेते हैं और उनकी प्रस्तुतियों से कुछ अलग ही तरह की वैचारिक उर्जा के पैदा होने की उम्मीद करते हैं जो कि गलत भी नहीं है पिछली प्रस्तुतियों की तुलना में प्रवीण शेखर की यह प्रस्तुति अपने दर्शकों के सामने कुछ नया नहीं दे पाई यद्यपि प्रवीण शेखर ने पर उसने भी कहीं कोई कोर कसर नहीं छोड़ी बस जो कुछ मंच पर घट रहा था वह टॉम एंड जेरी कार्टून जैसा था नाटक के सभी पात्रों दे अपनी भूमिका को पूरी शिद्दत के साथ जिया और वह इस कंटेंट को संभालने में अपनी ओर से जो कुछ भी कर सकते थे उन्होंने बाकायदा कर दिखाया नाटक ही कुछ कंपोजीशन बहुत अच्छी बनी जोकि प्रवीण शेखर के विशेषता भी होती है सभी कलाकारों की संवादों की अदायगी बेशक लाउड थी लेकिन इस तरह की प्रस्तुतियों के लिए यही अंदाज जरूरी भी था प्रवीण शेखर अपनी प्रस्तुतियों में प्रोफेशनल अंदाज रखते हैं इसलिए उनके लिए प्रेक्षागृह में बैठे सभी दर्शक सिर्फ दर्शक होते हैं जिसके कारण नाटक नाटक के होने से पहले वाली नाटक नौटंकी से बच जाता है और समय बर्बाद नहीं होता यह खुशी की बात है कि प्रवीण शेखर देश के तमाम हिस्सों में इलाहाबाद के रंगमंच का शानदार प्रतिनिधित्व करते हैं और इलाहाबाद की एक पहचान सुनिश्चित करते हैं इस प्रस्तुति में मंच के कई कोने अंधेरे में डूबे रहे जिसके कारण अंधेरे में मंच पर जो कुछ घटित हुआ उसे दर्शक नहीं देख पाए ऑल इंडिया न्यू़ थिएटर प्रवीण शेखर और उनकी टीम को इस प्रस्तुति के लिए बहुत-बहुत बधाई देता है और उम्मीद करता है अगली प्रस्तुति में और भी संतुलन कायम किया जाएगा ।

** समीक्षक अजामिल

** सभी चित्र विकास चौहा

शुक्रवार, 5 जनवरी 2018

नौटंकी दीपदान की प्रस्तुति

**नौटंकी

** स्वर्ग के

मंच पर हुई प्रतिज्ञा शौर्य गाथा की अविस्मरणीय प्रस्तुति

*दीपदान*

इलाहाबाद की सुप्रसिद्ध नाट्य संस्था स्वर्ग रंगमंडल के कलाकारों ने उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के प्रेक्षागृह में सुप्रसिद्ध नाटककार डॉ रामकुमार वर्मा लिखित कृति पन्ना धाय की नौटंकी शैली मैं शानदार प्रस्तुति की इस रचना का नौटंकी रूपांतरण बहुचर्चित नाट्य रूपांतरकार राज कुमार श्रीवास्तव ने किया था उत्तर प्रदेश के अनेक शहरों कस्बों से आए दर्शकों के अलावा स्थानीय रंगकर्मियों ं और संस्कृतिकर्मियों से खचाखच भरे प्रेक्षागृह में  इस नाटक नहीं  सभी दर्शकों को  मंत्रमुग्ध कर लिया नाक की प्रस्तुति काफी खुशी हुई थी और पारंपरिक  नौटंकी की शैली और आधुनिक नाटकों में चल रहे नए प्रयोगों के साथ मिलकर इस प्रस्तुति में काफी कुछ ऐसा किया गया था जो इसे आज के दौर के लिए प्रासंगिक बनाता था यह नौटंकी एक भव्य सेट का आभास देने वाले मंच की बेहतरीन परिकल्पना के साथ की गई संगीत में पूरे माहौल को और सजीव बनाने में बहुत सहयोग किया इस नौटंकी में लगभग सभी कलाकारों ने बहुत अच्छा अभिनय किया इलाहाबाद की बहुचर्चित अभिनेत्री और नाट्य निर्देशिका सोनम सेठ ने अपनी भूमिका को अपने किरदार में डूबकर किया जिसके कारण कई हिस्से नौटंकी के बहुत मर्मस्पर्शी हो गए अदिति की भूमिका भी दिल को छू लेने वाली थी हर स्थान पर अदिति की आवाज चरित्र के बिल्कुल अनुरूप थी अन्य कलाकारों ने भी अपने अपने किरदार को जीने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी नाटक नहीं संवादों की शैली संगीत मैं गोली मिली होती है बावजूद इसके संवाद कहानी को आगे ले चलने में कामयाब रहे राज कुमार श्रीवास्तव ने नौटंकी रूपांतरण बहुत अच्छा किया इस शानदार नौटंकी की ताकत बने बहुचर्चित लोकनाट्य समर्पित रंगकर्मी अतुल यदुवंशी उन्होंने इसका निर्देशन एक नए अंदाज में करके यह साबित कर दिया की नौटंकी भले ही कल की चीज़ हो लेकिन उसकी जरूरत आज भी उतनी ही है जितनी बीते कल में थी इस पूरे कार्यक्रम का संचालन पूरी ऊर्जा के साथ सुप्रसिद्ध कवि श्लेष गौतम ने किया और वह लगातार मंच के साथ दर्शकों को न सिर्फ जोड़ें रहे बल्कि उन्हें शिक्षित भी करते रहे ।

** समीक्षक अजामिल

** सभी चित्र वरिष्ठ छायाकार विकास चौहान

शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

नाटक अकेलापन की प्रस्तुति

××नाटक
अकेलापन
दास्तान बड़े बुजुर्गों के अकेलेपन की
पिछले दिनों उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के प्रेक्षागृह में जाने माने रंग निर्देशक अफजल खान द्वारा लिखित नाटक अकेलेपन की प्रस्तुति अफजल खान के निर्देशन में ही की गई आधुनिकता की गिरफ्त में दम तोड़ते पारिवारिक रिश्ते की व्यथा कथा इस प्रस्तुति में कहने की कोशिश की गई है पूरी दुनिया के फलक पर बड़े बुजुर्ग बहुत तेजी से अकेले होते जा रहे हैं और उनका यह अकेलापन धीरे-धीरे उन्हें मौत की तरफ ले जा रहा है इस प्रस्तुत की कथावस्तु बेहद प्रासंगिक है लेकिन अफसोस इस बात का है यह प्रस्तुति विचार और दृश्यों की पुनरावृत्ति और ठहराव की शिकार होकर उस तरह से प्रभावी नहीं बन पाई जैसे कि इसे होना चाहिए था और हम अफजल खान जैसे समर्थ निर्देशक से इसके प्रभावी होने की उम्मीद करते रहे हैं कहानी बुजुर्गों के अकेलेपन को ऊपर ऊपर स्पर्श करती रही और गहराई में बहुत सारे विरोधाभास छोड़ गई बड़े बुजुर्गों का अकेलापन बहुत बड़ी समस्या है जिसे उठाने के लिए इस समस्या की गहराई में जाना बहुत जरुरी है सोचना होगा कि इसमें दिखाई गई करोड़पति माली हालात वाली किसी बुजुर्ग महिला का अकेलापन किस तरह का होगा मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की आवश्यकता है और ऐसी स्त्री के साथ परिस्थितियां क्या बनेगी कौन उसके साथ होगा और कौन नहीं यह सारी बातें देखना होगा बावजूद इसके अफजल खान ने अपनी कोशिश में कहीं कोई कसर नहीं छोड़ी एकल प्रस्तुति में डॉक्टर प्रतिमा वर्मा को लगभग 30 वर्षों के बाद मंच पर देखना अभिभूत कर देने वाला था सच कहा जाए तो उनके बेहतरीन अभिनय दे एक कमजोर स्क्रिप्ट को भी सब तरफ से भराव दिया और संभाले रखने की कोशिश की प्रतिमा वर्मा की इस वापसी को सार्थक और सकारात्मक रुप से देखा जाना चाहिए और उम्मीद करना चाहिए कि अब वह मंच से फिलहाल कुछ वर्ष वापस नहीं होंगी कुल मिलाकर इस प्रस्तुति में और कल्पनाशीलता तथा वैचारिक समृद्धता की आवश्यकता थी जोकि अफजल खान जैसे निर्देशक सहज ही कर सकते हैं संगीत पक्ष कमजोर था जो फिल्रर की तरह पूरे नाटक में बज रहा था जिससे संवादों के सुनने में कठिनाई पैदा हो रही थी इस प्रस्तुति को इंडोनेशिया ले जाने से पहले हम आग्रह करते हैं कि नाटक के निर्देशक अफजल खान नाटक के मुख्य कथावस्तु को और अधिक तार्किक बनाने की कोशिश करें आज प्रस्तुति से नाटकीयता को कम करते हुए जिन देशों की अवधि जरूरत से ज्यादा हो गई है उसकी अवधि को संतुलित करने की कोशिश करें इसमें कोई शक नहीं कि अफजल खान ने एक बेहतर विषय पर एक अच्छी प्रश्न याद करने की कोशिश की है यह विषय आज अप्रासंगिक भी है जरूरी भी है और दुनिया भर के करोड़ों-करोड़ों बड़े बुजुर्गों की व्यथा-कथा भी व्यक्त करती है कोई भी प्रस्तुति कभी अंतिम नहीं होती उसमें लगातार बदलाव होते रहते हैं यह प्रस्तुति भी समय के अनुसार और अधिक बड़े बुजुर्गों के अकेलेपन की करीब आएगी हम इसकी उम्मीद करते हैं मंच पर रोशनी थी लेकिन उस रोशनी में अकेलेपन का अवसाद झूठा लग रहा था ।
** समीक्षक अजामिल
** सभी चित्र विकास चौहान
*** इस प्रस्तुति के लगभग ढाई सौ चित्र विकास चौहान ने क्लिक किए हैं जो रंगकर्मी इन तस्वीरों को अपने पास सहेजना चाहे वह विकास चौहान से संपर्क कर सकता है

सोमवार, 25 सितंबर 2017

20 साल पहले पत्थर चट्टी रामलीला कमेटी की रामलीला प्रस्तुति की कुछ झलकियां

**20 साल पहले ऐसे ही हुई थी  पत्थर चट्टी की रामलीला इलाहाबाद की पत्थर चट्टी रामलीला कमेटी आज एशिया की सबसे बड़ी रामलीला कमेटी है । एक लंबा वक्त गुजर गया इसे रामलीला के प्रति पूरी प्रतिबद्धता के साथ काम करते हुए । मुझे याद है कि सन 2000 में मैंने इस रामलीला कमेटी के लिए पहली बार 20 घंटे की रामलीला लिखी थी । एक अलग तरह का अनुभव था वह मेरा । पहली बार की प्रस्तुति की राम भक्तों ने बहुत सराहना की । इसके बाद के वर्ष में मैंने अपने ही लिखे रामलीला के आलेख को निर्देशित भी किया । इस रामलीला में लगभग 100 कलाकार अभिनय कर रहे थे और एक बड़ी टीम नेपथ्य मे थी । आज यह रामलीला कमेटी अपनी प्रस्तुति में हाईटेक हो चुकी है । यह रामानंद सागर के धारावाहिक रामायण का ऑडियो ट्रैक पर रामलीला की प्रस्तुति कर रही है जिसे लोग खूब पसंद कर रही हैं । दिन गुजर जाते हैं पर यादें रह जाती है । मुझे आज से 20 साल पहले की पत्थर चट्टी की रामलीला की कुछ तस्वीरें मिल गई तो मन किया कि आप के साथ इसे साझा करू। ं यह यादें हमारी धरोहर है और मुझे इस बात का गर्व है कि मैं पत्थर चट्टी रामलीला कमेटी के नींव के पत्थरों में लगा एक छोटा सा पत्थर हूं । यह मेरे लिए गर्व की बात है ।
** अजामिल

बुधवार, 20 सितंबर 2017

प्रयाग की हाईटेक रामलीला 30 साल पहले

** प्रयाग की रामलीला 30 साल पहले

प्रयाग की विश्व प्रसिद्ध रामलीला 30 साल पहले ही मेकेनिकल माइंड रामचंद्र पटेल ने हाईटेक कर दी थी । इसके पहले तक रामलीला को हाईटेक करने के छोटे-छोटे प्रयास होते रहे लेकिन ये कोशिशें  प्रयाग की सड़कों से होकर निकलने वाली चौकियोंं के छोटे-छोटे मंचों पर हो रही थी इसलिए इन मंचों पर प्रस्तुत किए जा रहे पात्रों में न बहुत ज्यादा गति थी और न अभिनेय ही था । 30 साल पहले रामचंद्र पटेल ने अहियापुर मोहल्ले के तमाम युवाओं को एकत्र करके भारती भवन लाइब्रेरी के सामने एक अस्थाई मंच बनाकर रामलीला प्रसंगों का हाईटेक अभिनय प्रस्तुत किया । इसके बाद इस रामलीला में पात्रों ने बाकायदा उड़ान भरी। ।क्रेन मैनेजमेंट के जरिए पात्र एक स्थान से दूसरे स्थान तक गए । संवादों को लाइट एंड साउंड के माध्यम से और भी ज्यादा प्रभावशाली बनाने का काम रामचंद्र पटेल ने किया । उस दौर के आकाशवाणी के  तमाम जाने माने  कलाकारों ने अपनी आवाज से इस रामलीला में  प्राण फूंक दिए  और एक बार  जैसे सब कुछ  सजीव हो उठा। दर्शकों के लिए यह सब कुछ न सिर्फ नया आकर्षण था बल्कि किताबों में पढ़ी गई कल्पनाओंं के साकार होने जैसा था । भारती भवन लाइब्रेरी के अस्थाई  मंच पर लाइट एंड साउंड के माध्यम से जब रामचंद्र पटेल के निर्देशन में रामलीला का हाईटेक ड्रामा पेश होता था तब कई हजार लोग उसे खड़े होकर देखते थे ।  30 मिनट की अवधि में पेश होने वाली है यह रामलीला प्रस्तुति अंधेरा होते ही शाम 7:00 बजे शुरू हो जाती थी और रात 1:00 बजे तक थोड़े थोड़े अंतराल के बाद इसके कई शो किए जाते थे । और मजेदार बात यह थी कि इसके हर शो में हजारों लोग देखने के लिए फिर जुट जाते थे । रामचंद्र पटेल कि यह रामलीला  लाखों लोग  देखते थे और इसे  प्रयाग कार  गौरव मानते थे । कहने में संकोच नहीं होना चाहिए क़ि प्रयाग की जिस हाईटेक रामलीला को आज एशिया की सबसे बड़ी हाईटेक रामलीला होने का खिताब मिला है, उसका बीज एक छोटे से मेकेनिकल माइंड राम चंद्र पटेल ने आज से 30 साल पहले रखा था जो आज तमाम नई टेक्नोलॉजी के साथ पत्थर चट्टी रामलीला कमेटी के मंच पर 10 दिनों तक हजारों दर्शकों को प्रतिदिन देखने को मिलता है । रामचंद्र पटेल की कल्पनाएं पत्थर चट्टी रामलीला कमेटी के मंच पर टेक्नोलॉजी के एक खास अंदाज में सामने आ रही है और रामचंद्र पटेल लगातार इस दिशा में नए नए प्रयोग करते ही जा रहे हैं जिसका राम भक्त हृदय से स्वागत करते है ।

**अजामिल ं

मंगलवार, 19 सितंबर 2017

नेपाल की रामलीला

++इलाहाबाद में हुई  नेपाल की रामलीला
रामकथा की लोकप्रियता दुनिया की सारी भाषाओं में सारी संस्कृतियों में और सारी सभ्यताओं में देखने को मिलती है। रामकथा मैं समाहित जीवन मूल्य
आज पूरी दुनिया को संस्कारों और सभ्यता का पाठ पढ़ा रहे हैं । इलाहाबाद के मेहता प्रेक्षागृह मैं अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के तत्वावधान में आयोजित एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में नेपाल की एक सांस्कृतिक संस्था के कलाकारों ने रामकथा के कुछ प्रसंगों का मंचन किया । इस मंचन में रामलीला के पात्र अंग्रेजी में संवाद बोल रहे थे जो कुछ अटपटा सा लग रहा था । उम्मीद की जा रही थी कि रामलीला की भाषा हिंदी होगी या नेपाली । भारत और नेपाल के संबंध सांस्कृतिक स्तर पर जोड़ने के लिए हिंदी या नेपाली भाषा ज्यादा कारगर है  । प्रसंग कई हिस्सों मैं प्रस्तुत किए गए । सभी नेपाली अभिनेता अभिनेत्रियों ने बहुत अच्छा अभिनय किया और रामकथा का संदेश दर्शकों तक पहुंचाने में सफलता पाई । राम और सीता दोनों बहुत सुंदर थे और उनकी वेशभूषा भारतीय रामलीला से अलग-थलग होने के कारण अपनी तरफ आकर्षित कर रही थी। संगीत पक्ष लाउड था लेकिन अनुष्ठानिक प्रस्तुतियों में संगीत का सामान्य से तेज होना जरूरी भी होता है । नेपाल के सभी कलाकारों को ऑल इंडिया न्यू थियेटर की बहुत-बहुत बधाई और फिर इलाहाबाद आने का विनम्र निमंत्रण ।
अजामिल

शनिवार, 16 सितंबर 2017

सेमिनार भारतीय सिनेमा का क्रमागत विकास

**व्यंजना का राष्ट्रीय सेमिनार

** सिनेमा उत्सव

भारतीय सिनेमा का क्रमागत विकास- एक परिचर्चा

भारतीय सिनेमा के क्रमागत विकास यात्रा के 105 गौरवशाली वर्ष बीत चुके हैं और आज हम दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्में बनाने वाले देशों में तीसरे स्थान पर हैं । हम ओसतन 6 फ़िल्में रोज बनाते है । इनमें  व्यवसायिक और कला फिल्में  दोनों शामिल हैं ।  भारतीय फिल्मों के क्रमागत विकास के पूरे परिदृश्य को देखने और उस पर एक समीक्षात्मक दृष्टि डालने के उद्देश्य से इलाहाबाद की जानी-मानी सांस्कृतिक संस्था व्यंजना ने मेहता प्रेक्षागृह मेंं भारतीय सिनेमा का क्रमागत विकास विषय पर एक राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया । चार सत्रो में विभाजित इस  आयोजन में  फिल्म विषय से जुड़े  अनेक  विशेषज्ञों ने  शिरकत की  । इस आयोजन को वरिष्ठ फिल्म समीक्षक प्रहलाद अग्रवाल फिल्म निर्देशक गौतम चटर्जी फिल्म समीक्षक आनंदवर्धन शुक्ल फिल्म समीक्षक मनमोहन चड्ढा फिल्म समीक्षक प्रोफेसर अनिल चौधरी फिल्म समीक्षक सुनील मिश्रा फिल्म समीक्षक प्रोफेसर महेश चंद्र चट्टोपाध्याय आदि विशेषज्ञों ने संबोधित किया । भारतीय  फिल्मों के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करते हुए लगभग सभी फिल्म विशेषज्ञो ने यह स्वीकार किया क़ि इतनी लंबी यात्रा तय करने के बाद भी भारतीय सिनेमा का बड़ा प्रतिशत अपनी सामाजिक भूमिका को लेकर मनोरंजन के आस-पास ही टिका हुआ हैं।  खास तौर पर हिंदी सिनेमा दर्शकों का बड़ा वर्ग इस माध्यम को टाइमपास माध्यम मानकर चलता है जबकि सिनेमा विभिन्न स्तरों पर आवाम की सभी गतिविधियों को प्रभावित कर रहा है । सिनेमा आज जिंदगी में एक निर्णायक भूमिका में है । किसी वक्त में भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में ऐसी फिल्में जरूर बनाई गई जो कमोबेश जिंदगी की सच्चाइयों को सामने लाती थी । फिर सिनेमा अपनी व्यवसायिकता और बाजार के दबाव में व्यापार की शर्तों पर बनाया जाने लगा । आज सिनेमा पूरी तरह से व्यापार बन चुका है और इससे जुड़े कलाकारों टेक्नीशियन और लेखको कीं फितरत भी सिनेमा को व्यापार की नजर से देख रही है । करोड़ों का व्यापार सिनेमा का उद्देश्य हो गया है  ।

सार्थक कलात्मक समानांतर सिनेमा के लिए गुंजाइश बहुत कम हो गई है । फिल्म विशेषज्ञो ने इस मौके पर फिल्म इंडस्ट्री को  यादगार फिल्मों के जरिए  योगदान देने वाले  नए पुराने फिल्मकारों को  याद किया और उन फिल्मों की भी चर्चा की जो भारतीय फिल्मों के क्रमागत विकास में टर्निंग पॉइंट कही जाती है । इस अवसर पर फिल्म कला के विशेषज्ञ गौतम चटर्जी ने कहा कि भारतीय फिल्मों के दर्शक आज  भी फिल्म देखने की कला से अनिभिज्ञ  हैं । फिल्म इंडस्ट्री ने उन्हें इस कला को सिखाने की कभी कोशिश नहीं की । समीक्षा का स्तर भी इतना अच्छा नहीं रहा कि वह दर्शकों को फिल्म देखने के लिए प्रेरित कर  पाती । प्रथम पंक्ति के जानकारी से लैस फिल्म समीक्षक फिल्म इंडस्ट्री के पास आज भी नहीं है । उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय फिल्म इंडस्ट्री देशी-विदेशी सफल फिल्मकारों का आजतक अनुकरण और अनुसरण ही करती आ रही है जिसकी वजह से दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्में बनाने के बावजूद हमारी फिल्मों की कोई ऐसी पहचान नहीं है जिसे हम भारतीय फिल्मों की पहचान बता सकें । इस मौके पर अधिकतर वक्ताओं ने फिल्म  इनसाइक्लोपीडिया मेंं दी गई भारतीय फिल्मों की उपलब्ध जानकारी ही विस्तार से परोसी जो बेशक रोचक थी परंतु इस जानकारी में मौलिक सोच का अभाव था । यह भी कहा गया क़ि भारतीय फिल्म निर्माता फिल्म समीक्षाओं की फिक्र नहीं करता और वह अपना समीक्षक अपने दर्शक को मानता है । वह समीक्षा पढ़कर फिल्म देखने भी नहीं जाता । फिल्म उसके लिए बैठकर मूंगफली खाने जैसा ही टाइमपास है । बावजूद इसके दो राय नहीं क़ि मौजूदा हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में बहुत अच्छी फिल्में बनाई जा रही हैं और बेहद सशक्त फिल्म निर्देशक पूरी दमदारी से अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप फिल्म बनाने के प्रयास में लगे हुए हैं । इस अवसर पर दादा साहब फाल्के के अविस्मरणीय योगदान को याद किया गया और उनके संघर्षों को भारतीय फिल्म इंडस्ट्री की बुनियाद बताया गया । दादा साहब फाल्के की श्रीमती जी को याद करते हुए मृदुला कुुशालकर ने कहा कि उनका भी योगदान दादा साहब फाल्के के योगदान से किसी स्थर पर कम नहीं था । ब्लैक एंड वाइट फिल्मों की प्रोसेसिंग वही किया करती थी ।

यह कार्यक्रम एक शानदार मौका था जिसमें फिल्म इंडस्ट्री के तमाम नामचीन लोग मौजूद रहे  । व्यंजना इलाहाबाद की उन संस्थाओं में एक है जो सिनेमा सहित तमाम कलाओ पर  वर्षभर  कार्यक्रमों का  आयोजन करती है और विभिन्न कलाओं के साधकों को मंच प्रदान करती है । इस आयोजन का संचालन वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी राजेश मिश्र और वरिष्ठ पत्रकार धनंजय चोपड़ा ने किया।   कार्यक्रम की ओवरऑल कंट्रोलर आशा अस्थाना और वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी मधु शुक्ला रही । यह एक ऐसा आयोजन था जो बहुत दिनों तक लोगों की स्मृति में रहेगा।

**चित्र व रिपोर्ट - अजामिल