शुक्रवार, 26 मई 2017

समानांतर की प्रस्तुति लीला नंदलाल की

जनसंस्कृति दिवस पर

समानांतर नहीं दिखाई

लीला नंदलाल की

इलाहाबाद की जानी-मानी नाट्यसंस्था समानांतर ने जन संस्कृत दिवस पर सुप्रसिद्ध कथाकार उपन्यासकार भीष्म साहनी की कहानी पर आधारित नाटक लीला नंदलाल की की सभी को मन मोह लेने वाली प्रस्तुति की । इस एकल प्रस्तुति में नवोदित अभिनेता धीरज गुप्ता ने पूरी उर्जा के साथ एक मंजे हुए कलाकार की तरह कथा के मुख्य पात्र के अलावा न जाने कितने पात्रों को जीवंत कर दिया और दर्शकों को अंत तक बांधे रखा । धीरज गुप्ता ने संवादों की अदायगी में बहुत से कलाकारों को कुछ इस तरह जिया जैसे नाटक के सभी पात्र उसी को लेकर बने हो । धीरज ने साबित कर दिया कि एक अभिनेता के रूप में उसमें काफी सामर्थ्य है और वह काफी कुछ कर सकता है ।

वरिष्ठ रंगकर्मी अनिल रंजन भौमिक के निर्देशन में प्रस्तुत किए गए इस नाटक में भौमिक दादा ने जिंदगी की विसंगतियों और विकृतियों को बखूबी अपने अभिनेता के जरिए उजागर करने में सफलता पाई । लीला नंदलाल की एक व्यंग नाटक है जो बड़ी सच्चाई के साथ आज की व्यवस्था में हमारे सपनों को चूर-चूर होता हुआ दिखाता है और यह भी बताता है कि इंसान किस तरह  इस भ्रष्ट व्यवस्था मैं असमर्थ हो चुका है ।

इस नाटक की सबसे बड़ी खूबी यही थी  कि यह बहुत थोड़े से संसाधनों के बीच पूरी ताकत के साथ खेला गया और इसके संदेश को जहां चोट करनी थी यह संदेश कहां तक पहुंचा  । समानांतर ने यह भी साबित कर दिया इस नाटक के जरिए कि कोई जरुरी नहीं है कि बड़े तामझाम के बीच ही नाटकों की प्रस्तुति की जाए और लाखों रुपए खर्च करके केवल एक शो करके पैसे की बर्बादी की जाए । अनिल रंजन भौमिक अनुदानजीवी रंगकर्मी नहीं है । नाटक के दर्शक ही कमोबेश उनके रंगमंच को जीवित रखे हुए हैं और यही दर्शक अनिल रंजन भौमिक के रंगकर्म के आधार हैं । नाटकों के लिए अनिल रंजन भौमिक किसी बड़े अनुदान का इंतजार नहीं करते बल्कि छोटी सी सीमाओं में पूरी सूझ-बूझ और लगन के साथ नाटकों की प्रस्तुतियां करना उनकी अपनी नाट्य शैली का हिस्सा है जो बहुत से लोगों को प्रेरित करता है । कथ्य से लेकर प्रस्तुति तक अनिल रंजन  भौमिक का रंगमंच कुछ नए की तलाश करता चलता है शायद यही वजह थी कि लीला नंदलाल की नाटक में केवल एक अभिनेता को लेकर उन्होंने बहुत ही प्रभावशाली प्रयोग किया । इलाहाबाद के स्वराज्य विद्यापीठ के छोटे से सभागारनुमा जगह पर यह प्रस्तुति की गई जिसे लगभग 100 लोगों ने देखा और सराहा । इस प्रस्तुति ने यह बात भी साफ कर दी क़ि रंगकर्म की गति को बनाए रखने के लिए लगातार अच्छे रंगकर्म को करने की आवश्यकता है न क़ि सुविधाओं को जुटाने का बहाना लेकर समय बर्बाद करने की । अनिल रंजन भौमिक जमीन से जुड़े रंगकर्मी है इसलिए इन्हें अपने चारों तरफ मंच दिखाई देता है, जहां से खड़े होकर वह अपनी बात कह सकते हैं । अनिल रंजन भौमिक की नजर में बात बड़ी चीज है , बाकी तो बात को संप्रेषित करने का साधन मात्र है और कला इसी में है कि बात हर हाल में कहीं जाए ।

ऑल इंडिया न्यू थिएटर समानांतर के सभी सदस्यों और वरिष्ठ रंग निर्देशक अनिल रंजन भौमिक को इस शानदार प्रस्तुति के लिए बहुत-बहुत बधाई देता है और उम्मीद करता है कि संस्था ऐसी ही सार्थक प्रस्तुतियां करती रहेगी । धीरज गुप्ता को बहुत बहुत बधाई । बड़ी संभावना है इस अभिनेता के भीतर । विनम्रता इस अभिनेता का आभूषण बने और यह मेहनत से काम करता हुआ बहुत आगे तक जाए , हम यही कामना करते है ।

समीक्षक  अजामिल

सोमवार, 1 मई 2017

नाटक ईडिपस की शानदार प्रस्तुति

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इलाहाबाद में  ग्रीक नाटक  ईडिपस  की शानदार प्रस्तुति ****
केवल इलाहाबाद में ही मैंने ग्रीक नाटक ईडिपस की अलग-अलग  निर्देशकों द्वारा  निर्देशित लगभग सात प्रस्तुतिया देखी हैं । इन प्रस्तुतियों में नई बुनावट का अभाव तो था ही , ये एक दूसरे से भी बहुत प्रभावित रही । कमोबेश परिवर्तन के साथ इन्हें पेश किया गया जबकि अच्छे नाटकों में समयानुकूल निर्देशक परिवर्तन करते रहते हैं , नई तकनीक को शामिल करते हैं  , संगीत बदला जाता है लेकिन यह सब तो तब होता है जब समर्थ निर्देशक नाटक को नए ढंग से डिजाइन करने में सक्षम हो ।
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय , नई दिल्ली से प्रशिक्षित वरिष्ठ रंगकर्मी डॉक्टर विधु खरे ने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा की इलाहाबाद शाखा मैं प्रशिक्षित फिल्म एंड परफॉर्मिंग आर्ट्स के छात्रों को लेकर उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के बीमार प्रेक्षागृह मैं ग्रीक नाटक ईडिपस की प्रस्तुति बिल्कुल नई डिजाइन के साथ की । इस प्रस्तुति का संगीत काफी रिच था और ईडिपस के समय को काफी उत्तेजना और हंगामे के साथ रेखांकित करता था । नाटक के संगीत ने समयानुकूल वातावरण का निर्माण मंच पर सफलतापूर्वक किया । संगीत की मात्रा काफी सघन थी बावजूद इसके किसी ने भी संवादों के ठीक से सुनाई न देने की शिकायत नहीं की और संवाद जितने सुनाई दिए उतने से ही नाटक को देखने का आनंद उठा लिया ।
नाटक के अनुवाद की भाषा उर्दू थी । नाटक के पात्रो की जुबान पर यह भाषा पूर्वाभ्यास की कमी के कारण रवाँ नहीं हो पाई थी बावजूद इसके कलाकारों ने वातावरण को सजीव बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी । मुश्किल यह है कि उर्दू दिमाग से नहीं बोली जाती , दिल से बोली जाती है , इसलिए भी संवादों की अदायगी और ज्यादा मेहनत की मांग कर रही थी । हां विधु खरे ने नाटक को  डिजाइन बहुत अच्छा किया था  । एक मौलिक परिकल्पना आरंभ से अंत तक नाटक मैं तैरती हुई दिखाई दे रही थी और दर्शकों को बांधे हुए थी । एकदम प्रोफेशनल काम किया था विधु खरे ने । प्रशिक्षित और अप्रशिक्षित निर्देशकों के काम में कहां और क्या अंतर होता है , यह इस प्रस्तुति में साफ दिखाई पड़ रहा था ।
सुजॉय घोषाल का प्रकाश संचालन हमेशा की तरह लुभा लेने वाला था । सुजोय घोषाल अपने प्रकाश संचालन में प्रकाश की भाषा और आवश्यकता से अधिक ध्यान दृश्य की सुंदरता की ओर आकर्षित करते हैं  । गीमिक्स का खेल उन्हें बहुत पसंद है  । LED लाइट्स ने उनके काम को आसान और सीमित कर दिया है  । लाल और नीली रोशनी उन्हें बहुत प्रिय है और उनका सारा जादू इन्ही दो रोशनी के इर्द गिर्द रहस्य पैदा करता है । सुजॉय घोषाल एक प्रयोगधर्मी रंगकर्मी हैं  । लोग उनसे बहुत उम्मीद करते हैं । विधु खरे जैसी निर्देशिका  के साथ  उनके काम की खिलावट दोबारा हो जाती है ।
अंत में इतना ही कहना होगा क़ि यह प्रस्तुति बहुत दिनों तक लोगों के दिल और दिमाग पर छाई रहेगी । डॉक्टर विधु खरे को अगर अवसर मिलता रहे तो निश्चय ही रंगकर्मियों को उनके हर हस्तक्षेप पर गर्व होगा  । उनके भीतर एक समर्थ निर्देशक मौजूद है जिसे बस अवसर की तलाश है  ।
ऑल इंडिया न्यू थिएटर इस प्रस्तुति के लिए उन्हें बहुत-बहुत बधाई और सभी कलाकारों को उनके भविष्य के लिए ढेर सारी शुभकामनाए देता है ।
समीक्षक / अजामिल
** सभी चित्र वरिष्ठ छायाकार विकास चौहान के सौजन्य से

बुधवार, 26 अप्रैल 2017

कृष्ण की भूमिका में कौशिक गौतम

इलाहाबाद के वरिष्ठ रंगकर्मी कौशिक गौतम ने विश्व प्रसिद्ध आध्यात्मिक संस्था इस्कॉन इलाहाबाद में कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में कृष्ण की भूमिका निभाई थी जिसे दर्शकों ने बहुत पसंद किया था उनकी इस तस्वीर को इलाहाबाद के वरिष्ठ छायाकार विकास चौहान ने क्लिक किया है ।

रविवार, 26 मार्च 2017

बहुत आसान है रंग निर्देशक बनना

झूठ बोले  कौवा काटे
अगर ऐसा है  तो है
रंग निर्देशक बनना बहुत आसान है संस्कृति मंत्रालय नई दिल्ली से नाटक का कोई प्रोजेक्ट जुगाड़ लगा कर पास करा लीजिए उसके बाद नाटक की प्रस्तुति के लिए कोई मजबूर सच्ची मुच्ची का रंग निर्देशक मोल भाव करके हायर कीजिए वही निर्देशन करेगा और आपकी प्रस्तुति को प्रस्तुति के योग्य बना देगा हां याद रखिए संस्कृति मंत्रालय के नियमानुसार जो भी प्रचार  सामग्री अथवा पोस्टर आदि प्रकाशित होगा उस पर आपको प्रोजेक्ट पास कराने वाले को अपना नाम प्रस्तुति के रंग निदेशक के रूप में बड़े-बड़े फोंट में प्रकाशित करना होगा नहीं इसमें झूठ कुछ भी नहीं है आजकल अधिकतर रंग संस्थाएं यही कर रही हैं काम कोई करता है नाम किसी का होता है और यह तो हमेशा से होता है तो इसमें आश्चर्य कैसा तो भैया निर्देशन को मारो गोली पहले प्रोजेक्ट पास कराओ रंग निर्देशक तो तुम संस्कृति मंत्रालय के नियमानुसार माने ही जाओगे रंग निर्देशक बनना पहले कभी इतना आसान नहीं था यही कारण है कि आज अभिनेता कम है निर्देशक ज्यादा है ।

गुरुवार, 9 मार्च 2017

नाटक सूतपुत्र के कुछ दृश्य

सभी चित्र अजामिल

नाटक सूतपुत्र के कुछ दृश्य

सुप्रसिद्ध नाटककार विनोद रस्तोगी द्वारा लिखित नाटक सूतपुत्र की प्रस्तुति जगत तारन कॉलेज के रवीन्द्रालय प्रेक्षागृह में की गई कुंती पुत्र कर्ण के अंतर्द्वंद पर केंद्रित यह नाटक बहुत सराहा गया सुजॉय घोषाल के प्रकाश संचालन में इस नाटक के वातावरण को सजीव करने में बहुत सहायता मिली।
सभी चित्र अजामिल

मंगलवार, 7 मार्च 2017

थक गए है तो क्या हुआ


पंडित सत्यदेव दुबे से अजामिल की बात-चीत
उन्होनें नाट्य-कर्म के साथ अपने रिश्ते को अभी तक तोड़ा नहीं है, बल्कि वो हर पल नाटक ही जीते है, नाटक ही ओढ़ते बिछाते हैं। नाट्य-चिंतन को अगर उनकी जिंदगी से निकाल दिया जाये, तो उनका ही मानना है, कि उनके पास कुछ भी शेष नहीं बचेगा। बात सच भी है, भारतीय भाषाओं के मद्देनजर रंगकर्म को समर्पित, प्रयोगशील, प्रतिबद्ध, वरिष्ठतम् रंगकर्मियों की आज अगर कोई सूची बनायी जाय और उसमें पं0 सत्यदेव दुबे का नाम उनके रंगकर्म के प्रति समुचित आदर-भाव के साथ उस सूची में शामिल न किया जाये तो वह सूची न सिर्फ अधूरी मानी जायेगी, बल्कि उसके बहाने हिन्दी और बहुत-सी इतर भाषाओं के रंगकर्म से जुड़ी महत्वपूर्ण चर्चा का विश्वसनीय आधार छूट जायेगा। सच तो यह है, कि हिन्दी रंगमंच का इतिहास आज पं0 सत्यदेव दुबे के उल्लेख के बगैर लिखा ही नहीं जा सकता । पं0 सत्यदेव दुबे भारतीय रंगकर्म का एक ऐसा व्यक्तित्व हैं, जो अपने काम के प्रति लगन, समर्पण, भावुकता और उत्तेजना से भरा हुआ है, जो थकान में रहकर भी अपने काम और विचारों से हमें चौंकाता है, और हमारा मार्ग-दर्शन करता है। पं0 सत्यदेव दुबे का कार्य-क्षेत्र बहुआयामी है। बहुत बार अपनी ही बातों में जाने-अंजाने विरोधाभाषों से घिरे रहकर भी पं0 सत्यदेव दुबे बड़ी साफगोई से बतियाते हैं। यही विरोधाभाष और इन्ही के बीच रंगकर्म में संतुलन की तलाश का नाम पं0 सत्यदेव दुबे है। प्रस्तुत है, अजामिल से विभिन्न विषयों पर उनसे हुई लम्बी बातचीत के कुछ प्रमुख अंश...

प्रश्न : रंगकर्म को समर्पित अपनी रंगयात्रा को कैसे याद करेंगे ?
सच तो यह है, कि मैंने कभी ये कल्पना भी नहीं की थी, कि रंगकर्म एक दिन मेंरी जिंदगी का इतना अहम् हिस्सा बन जएगा। आज मैं अपनी हर साँस में नाटक और सिर्फ नाटक के बारे में सोचता हूँ। इसके बिना मैं और कुछ सोच भी नहीं सकता। रंगकर्म करते हुए मैंने अपनी जिंदगी में कभी किसी चीज की की महसूस नहीं की।
प्रश्न : कहाँ से शुरू हुई आपकी रंगयात्रा ?
शुरूआती दौर में मैं खुद भी कुछ नहीं जानता था। विलासपुर मध्यप्रदेश मंे सन् 1936 में एक धनी परिवार में मेरा जन्म हुआ। अंग्रेजी स्कूलों में मेरी शिक्षा-दिक्षा हुई। परिवार में व्यापार होता था। लेकिन मेरा मन न तो व्यापार में रमा और न पैसा कमाते रहना मेरे जीवन का कभी अन्तिम लक्ष्य रहा। बचपन से ही चाहता था, कि कुछ ऐसा करूँ, जिससे सारी दुनिया में मेरा नाम हो, और यही लालसा लिए क्रिकेट में नाम कमाने के उद्देश्य से मैं बम्बई आया था, और मजा देखिए, नाम कमाने की कौन कहे क्रिकेट का मैं एक मामूली खिलाड़ी भी नहीं बन सका। अंग्रेजी और मराठी का ज्ञान होने के कारण मुझे पी0 डी0 शिनोय और निखिल एजकी जैसी हस्तियों के साथ बम्बई में रहकर रंगकर्म करने का अवसर मिला। इनके साथ बतौर अभिनेता मैं काम करता रहा और रंगमंच की बारीकियाँ सीखता रहा।
लेकिन मेरी रंगयात्रा विधिपूर्वक सन् 1959 में आरम्भ हुई- पूरे आत्मविश्वास के साथ। उसके बाद जो सिलसिला शुरू हुआ तो मैने हिन्दी के अलवा गुजराती, मराठी, अंग्रेजी आदि बहुत सी दूसरी भाषाओं में भी सौ से ज्यादा नाटको के कई-कई शोज किए। डा0 धर्मवीर भारती का सुप्रसिद्ध काव्य नाटक अन्धायुग मैंने पहली बार सन् 1952 में बम्बई में किया था। इसके सौ से अधिक शो मैंने वभिन्न शहरों में किये। सन् 1971 में मुझे संगीत नाटक अकादमी ने सम्मानित किया था, निर्देशन के लिए। सच तो ये है, कि मैंने अपनी रंगयात्रा में कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और न मुझे कभी पूर्ण संतोष ही हुआ। आज इतना वक्त गुजर जाने के बाद भी लगता है, कि अभी बहुत कुछ छूटा हुआ है, जिसे मैं कर सकता हूँ और मुझे करना चाहिए।
प्रश्न : मौजूदा दौर में रंगमंच को आप किस प्रकार के संकटों से घिरा हुआ पाते हैं ?
भाई एकजुट होकर सभी रंगकर्मी जिस संकट की चर्चा करते हैं वह है दर्शकों का अभाव। इसमें संदेह नहीं कि तमाम टी0वी0 चैनलों और मनोरंजन के दूसरे साधन आसानी से उपलब्ध होने के कारण नाटक देखने वाले दर्शकों की संख्या में कमी आयी है, लेकिन हमने भी तो इन हालातों को रंगमंच की स्थिति मानकर चुप्पी साध रखी है। इलेक्ट्रानिक क्रान्ति से आतंकित होकर हम खुद ही नाटक को गए गुजरे जमाने की चीज मान बैठे हैं। क्या यह एक बड़ी भूल नहीं है ? क्या हमने कभी सोचा कि विभिन्न क्षेत्रों में हुए परिवर्तन के साथ-साथ रंगकर्म के आन्तरिक संकट भी यदि गहरे हुए हैं, तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है ? हमारी प्रतिबद्धता और नाटक के प्रति वास्तविक निष्ठा में भी तो गिरावट आयी है। काम से ज्यादा हम आज धर्म और यश को क्या अन्तिम उपलब्धि नहीं मान बैठे हैं ? रंगमंच से जुड़ी नई तकनीकि के प्रति हमारी कोई रूचि, कोई रूझान कोई जिज्ञासा क्या कहीं दिखाई देती है ? लकीर के फकीर बने रहकर हम रंगमंच के विकास की दिशा मंे कभी कुछ नहीं कर सकते। मैं कभी यह नहीें मानता कि दर्शकों को अगर अच्छी चीज दिखाई जाय तो वो उसे नहीं देखेंगें। दर्शकों के अभाव का संकट उन रंगकर्मियों के सामने ज्यादा गहरा है, जो अभी तक अपनी प्रस्तुतियों के प्रति अपने दर्शकों का विश्वास नहीं जीत पाये हैं।
प्रश्न : तो क्या हमें यह समझौता कर लेना चाहिए कि आज दर्शक जो कुछ देखता है, हम भी उसे वही दिखायें ?
मैंने यह तो कहीं नहीं कहा। आप अपने दर्शकों को जो कुछ भी दिखायें उसमंे एक परफेक्शन होना चाहिए। दर्शकों में अच्छे नाटकों को देखने ओर सराहने की तमीज पैदा करना भी तो एक अच्छे रंगकर्मी का ही काम होता है। कोई नाटक अगर किसी दर्शक के मन में नाटक देखने की ललक पैदा नहीं करता तो, यह बात आप पक्की तौर पर जानिए, कि प्रस्तुति में कहीं न कहीं कमजोरी अवश्य थी। नाटक का असर दर्शक के दिमाग पर थ्री-डाइमेंशनल होता है। अच्छे नाटक में मनोरंजन और विचार का एक ऐसा कॉकटेल होता है, जिसे बरसों-बरस दर्शक याद रखता है, और कन्टेन्ट उसे हॉन्ट करता है। इसके विपरीत रद्दी प्रस्तुतियाँ नाटकों की ओर से दर्शकों को विमुख करती हैं।
प्रश्न : क्या आपको नहीं लगता कि टी0वी0 सीरियल्स और फिल्मों के इस दौर में नाटकों का बाजार ठंडा हो गया है ? गिव एण्ड टेक की इस भ्रष्ट व्यवस्था में ईमानदारी से रंगकर्म करने के लिए अवसर और संभावनाएं समाप्त हो गये हैं ?
मुझे तो ऐसा नहीं लगता। यह समस्याओं के सामने हमारी एक निगेटिव एप्रोच है। निराकरण तो समस्याओं से जूझने पर ही मिलेगा, बहानेबाजी से तो रंगकर्म ठंडा हो जायेगा। आप पहले दर्शकों का विश्वास तो जीतिए, उन्हें भरोसा दिलाइये, कि नाटक दिखाकर आप उनका वक्त जाया नहीं करेंगे। मैंने अपनी प्रस्तुतियों में दर्शकों की कमी कभी महसूस नहीं की। चार-चार महीने पहले मेरे नाटकों को देखने के लिए दर्शकों ने सीटें बुक करायी हैं। आज आप जिन कलाकारों को फिल्मों या टेलीविजन पर देख रहे हैं, उनका बड़ा प्रतिशत रंगमंच से होकर ही वहाँ तक पहुँचा है। रंगमंच अभिनय की जीवंत कार्यशाला है। सच्चे अभिनेता को रंगमंच इतना पीसता है, कि जहाँ गधे भी घोड़े बन जाँए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
प्रश्न : अभिनय के प्रशिक्षण को आप आवश्यक मानते हैं ?
देखो भाई ! अभिनय काफी हद तक एक कुदरती कला है। जिंदगी में सभी लोग कमोबेश अभिनय करते ही रहते हैं, और इसी अभिनय में जिंदगी का सच छिपा होता है, लेकिन मेरा मनना है, कि अभिनय न तो सीखा जा सकता है, और न सिखाया जा सकता है, बावजूद इसके अभिनय के कुछ ऐसे पहलु अवश्य होते हैं, जिनकी जानकारी के बिना किसी अभिनेता को मंच का अनुशासन आना मुश्किल होता है। भाषा और संवादों की अदायगी का सतही ज्ञान एक अच्छा अभिनेता बनने में बाधा उत्पन्न करता है। आज ऐसे बहुत से अभिनेता हैं, जो विभिन्न भाषाओं में नाटक, फिल्में और टी0वी सीरियल्स करते हैं, लेकिन अफसोस इस बात का है, कि वे अपनी भाषा के व्याकरण मुहावरे और शब्दों की सही ध्वनि तक से अपरिचित हैं। अभिनय कला का बुनियादी उद्देश्य ही यही है, कि कोई अभिनेता अपनी बात को कितने अर्थ-पूर्ण तरीके से संप्रेषित करता है। केवल कमजोर अभिनेता भंगिमाओं का ढ़कोसला खड़ा करते हैं। उनके अभिनय में जीवन की स्वाभाविकता नहीं होती, बल्कि कमजोरियों को छिपाने का एक कथित अभिनय पाखंड दिखाई देता है।
प्रश्न : दूसरी भाषाओं के रंगमंच को लेकर आपके अनुभव क्या रहे हैं ?
कर्म की सीमाओं में बँधा हुआ है। यहाँ सृजनात्मकता की लगभग हत्या हो चुकीहिन्दी के अलावा मैंने मराठी रंगकर्म भी किया है। हिन्दी रंगमंच की सबसे बड़ी कमजोरी यही है, कि इसमें अभी तक पेशेवराना अंदाज नहीं बन सका है। पेशेवर अभिनेता को यहाँ दोयम दर्जे का अभिनेता माना जाता है। रंगकर्मियों में रंगकर्म को एक काम-चलाऊ अंदाज में देखने और करने की एक गंदी प्रवृत्ति यहाँ है। चल जायेगा, निकल जायेगा जैसा मुहावरा हिन्दी रंगमंच पर ही सुनने को मिलता है, जबकि रंगकर्मियों का विश्वास होना चाहिए कि यही सही है। मराठी अथवा बांग्ला रंगमंच पर प्रस्तुति, अभिनय और अभिनेता पूरी तरह प्रोफेशनल हो चुका है। दर्शक पूरे आत्मविश्वास के साथ इन भाषाओं के नाटकों को देखता है। सिर्फ बम्बई में ही डेढ़ सौ से लेकर दो सौ तक नये पुराने नाटक हर साल होते हैं, और हर नाटक के कई-कई शो किये जाते हैं। अनुदानों ने भी नाटकों का बड़ा अहित किया है। आज रंगकर्मी अपने दर्शकों के अनुराग पर कम, सरकार के अनुदान पर ज्यादा भरोसा कर रहे हैं। सांस्कृतिक केन्द्रों, नाट्य-अकादमियों और बहुत सी दूसरी रंग-संस्थाओं ने कोई अनुराग-धर्मी रंगकर्मी पैदा होने ही नहीं दिया। रंगकर्म की जरा भी तमीज रखने वाले अधिकतर अधिकारियों ने अनुदान का लालच देकर रंगकर्मियों को कठपुतलियों में बदल दिया है। सारा कुछ अनुदानों, लेनदेन और पहुँच पर जाकर ऐसा सिमट गया है, कि दर्शक आज बेशऊर उपभोक्ता दिखाई देने लगा है। लाखों रूपये अनुदान के खर्च करके जब कोई संस्था नाटक अलीबाबा चालीस चोर करती है, तब उसके सामाजिक सरोकार स्वयं सिद्ध हो जाते हैं। हिन्दी रंगमंच आज भी दरबारी रंग है। हिन्दी रंगमंच के पास कोई सामाजिक समर्थन भी नहीं है। अनुदानों के भरोसे रंगकर्म जिन्दा नहीं रह सकता। यह काम जनचेतना से जुड़ा है, और जनता ही इसे जीवित रखती है। रंगकर्म एक उत्सव है, जो हमारे जीवन से जुड़कर साँस लेता है।

प्रश्न : इसका मतलब यह हुआ कि सांस्कृतिक केन्द्रों और नाट्य अकादमियों की कोई भूमिका नहीं है ?
मेरी नजर में फिलहाल कोई भूमिका नहीं है। मैने आज तक अपने नाटकों के लिए अनुदान स्वीकार नहीं किया। शायद यही वजह है, कि मैं अपनी वैचारिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बचाये रख सका हूँ। मै कभी किसी अनुदान अथवा पुरस्कार के लिए रंगकर्म नहीं करता।
प्रश्न : ओमपुरी, शबाना आजमी, नसीरउद्दीन शाह और स्व0 अमरीश पुरी आदि न जाने कितने अभिनेताओं के आप गुरू रहे हैं। इनकी सफलता को देखकर आपको कैसा लगता है ?
अपने बच्चे किसे अच्छे नहीं लगते ? मुझे इस बात की खुशी है, कि आज भी बड़े से बड़ा अभिनेता मेरे एक इशारे पर समय निकाल कर रंगमंच को मेरे साथ जीने के लिए तैयार हो जाता है। रंगमंच के साथ इन बड़े अभिनेताओं का रिश्ता आज भी बना हुआ है। एक नाटक करने के बाद ये अभिनेता कई-कई महीनों तक अपने को ऊर्जावान महसूस करते हैं।